कॉन सिटी मूवी रिव्यू: - सिनेमा की दुनिया में कॉन्फिडेंस ट्रिक्स्टर की कहानियां हमेशा से दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही हैं। जब कोई आम इंसान परिस्थितियों के शिकार होकर चालाकी का सहारा लेता है और हम उसे जड़ से सपोर्ट करते हैं, तो यह भावना बेहद प्राइमल और संतोषजनक होती है। दुलकर सलमान की फिल्मों से लेकर स्टीवन स्पीलबर्ग की 'कैच मी इफ यू कैन' तक, ऐसी कहानियां लंबे समय तक याद रहती हैं। ऐसे में 'कॉन सिटी' जैसी फिल्म का इंतजार रोमांचक था, जिसमें अर्जुन दास और अन्ना बेन मुख्य भूमिकाओं में हैं।

हरीश दुरैरज द्वारा निर्देशित यह तमिल फिल्म एक असामान्य गैंग ऑफ कॉन आर्टिस्ट्स की कहानी पेश करती है, जो एक फाउंड फैमिली के रूप में साथ रहते हैं। शुरुआती प्रीमिस और कलाकारों की मेहनत फिल्म को मनोरंजक बनाने की पूरी क्षमता रखती है, लेकिन लेखन की कमजोरियां इसे अपनी राह से भटका देती हैं।

फिल्म की कहानी और प्रीमिस: संभावनाओं से भरा लेकिन अधूरा

फिल्म मुल्की, कर्नाटक में सेट है जहां सरवनन (अर्जुन दास), मिथ्रा (अन्ना बेन), उनका दिव्यांग बेटा जीवा (अगिलन), जैकी (योगी बाबू) और जैकी की मां जानकी (वडिवुक्करसी) एक होटल चलाते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन वे असल में परिवार नहीं, बल्कि चेन्नई से भागे हुए अपराधी हैं। सरवनन का बिजली विभाग में फ्रॉड, मिथ्रा का फर्जी रेंटल मैनेजमेंट स्कैम और जैकी-जानकी का ट्रस्ट के जरिए पैसे घुमाने का धंधा सब बेनकाब हो चुका है।

जब एक पूर्व पुलिस अधिकारी उनके परिवार के बच्चे को अगवा कर लेता है, तो उन्हें एक आखिरी बड़ा स्कैम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। फिल्म यहां से एक रोमांचक जर्नी की ओर बढ़ती है, जहां छोटे-छोटे स्कैम्स से लेकर बड़े खुलासों तक सब कुछ दिखाया गया है। लेकिन दुर्भाग्य से, लेखन इन संभावनाओं को पूरा नहीं कर पाता।

तमिल सिनेमा की मिड-बजट फिल्मों की एक लंबी लिस्ट में 'कॉन सिटी' भी शामिल हो जाती है, जो दिलचस्प वन-लाइनर पर निर्भर रहकर कैरेक्टर डेप्थ और इनजीन्युइटी को कुर्बान कर देती है। दर्शक पहले हाफ के अंत तक महसूस करने लगते हैं कि फिल्म अपनी अनोखी आइडियाज पर बहुत ज्यादा जोर दे रही है, लेकिन पेऑफ कमजोर है।

डायरेक्शन और स्टाइल: टेक्निकल ब्रिलियंस लेकिन खोखला

हरीश दुरैरज ने फिल्म को विजुअली आकर्षक बनाने की पूरी कोशिश की है। हाई-स्पीड मोकोबॉट शॉट्स, स्लो-मोशन वॉक्स, पैरेलल कट्स और ग्रैंड रिवील्स जैसी तकनीकें इस्तेमाल की गई हैं। अगर स्क्रिप्ट मजबूत होती तो ये सब तत्व फिल्म को और ऊंचाई दे सकते थे। लेकिन कंट्रिव्ड सिचुएशंस और सतही लेखन के कारण ये स्टाइल ओवरडन लगता है।

फिल्म की रनटाइम लगभग 152 मिनट है, जिसमें पहला हाफ तेज रफ्तार से स्कैम्स दिखाता है, जबकि दूसरा हाफ इमोशनल और एक्शन पर फोकस करता है। संगीत शॉन रोल्डन का है, जो मूड को सपोर्ट करता है, लेकिन कहानी की कमियों को ढक नहीं पाता। डीओपी अरविंद विश्वनाथन की कैमरा वर्क सराहनीय है।

कई दृश्यों में फिल्म खुद को बहुत स्मार्ट समझती दिखती है, लेकिन दर्शक आसानी से अगले मोड़ को भांप लेते हैं। यह 'ट्राई-हार्ड' एप्रोच फिल्म की मुख्य समस्या है।

परफॉर्मेंस: कमिटेड कास्ट फिल्म को सहारा देता है

अर्जुन दास अपनी भूमिका में बेस्ट फॉर्म में हैं। सरवनन के किरदार में वे सॉफ्ट और वार्म नजर आते हैं, जो उनके हाल की इंटेंस भूमिकाओं से अलग है। अन्ना बेन मिथ्रा के रूप में अच्छी हैं, हालांकि स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा गहराई नहीं दे पाती। योगी बाबू और वडिवुक्करसी की मदर-सन जोड़ी फिल्म का सबसे मजेदार हिस्सा है, जो कॉमेडी के जरिए राहत प्रदान करती है।

अगिलन छोटे जीवा के रोल में प्रभावशाली हैं। सपोर्टिंग कास्ट में वीटीवी गणेश, राधा रवि, थंबी रामैया जैसे कलाकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। कुल मिलाकर, कलाकारों की मेहनत फिल्म की कमियों को काफी हद तक कवर कर लेती है।

थीम्स और बैकग्राउंड: सिस्टम के खिलाफ संघर्ष

'कॉन सिटी' मिडिल क्लास की निराशा, सिस्टम की खामियों और फैमिली बॉन्ड्स की कहानी कहती है। ये लोग परिस्थितियों के शिकार हैं जो ट्रिकरी का रास्ता चुनते हैं। फिल्म समाज की नजरों में 'कॉन' बनने वाले इन किरदारों के इमोशंस को दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन बैकग्राउंड और कॉन्टेक्स्ट को और गहराई दी जा सकती थी।

रिसीट प्रिंटर के जरिए मनी जेनरेशन वाली कुछ रिपोर्ट्स भी फिल्म के प्लॉट से जुड़ती दिखती हैं, जो इसे और यूनिक बना सकती थीं, लेकिन मुख्य फोकस कॉन फैमिली और किडनैपिंग पर है। यह ट्रोप पुराना है, फिर भी अच्छे हैंडलिंग से तरोताजा हो सकता था।

कमियां और सुधार के अवसर

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह अपनी स्टाइल पर इतना फोकस करती है कि सबस्टेंस पीछे छूट जाता है। कैरेक्टर्स सतही रह जाते हैं और ट्विस्ट्स पहले से अनुमानित लगते हैं। अगर लेखन में और मेहनत की जाती तो यह एक क्लासिक कन आर्टिस्ट फिल्म बन सकती थी।

दूसरे हाफ में पंच की कमी महसूस होती है, हालांकि अंत दर्शकों को संतुष्ट कर सकता है। कुल मिलाकर, यह एक एवरेज एंटरटेनर है जो बेहतर हो सकता था।