पहले के दौर में बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर या वैज्ञानिक बनने का सपना देखते थे। माता-पिता भी इन्हीं पेशों को सम्मान और स्थिरता का प्रतीक मानते थे। लेकिन आज का समय बदल रहा है। सोशल मीडिया की चमक-दमक ने बच्चों की दुनिया को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। हालिया रिसर्च बताती है कि अब ज्यादातर बच्चे यूट्यूबर, टिकटॉक क्रिएटर या सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। यह बदलाव सिर्फ सपनों का नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी की सोच का रूपांतरण है।

सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव: रिसर्च क्या कहती है?

2021 से 2024 तक की एक प्रमुख स्टडी में पाया गया कि मिडिल और हाई स्कूल के 60 प्रतिशत से ज्यादा छात्र-छात्राएं सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। इस रिसर्च में 7 साल के छोटे बच्चे भी शामिल थे। बच्चे स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को देखकर ही यह फैसला ले रहे हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर सफल क्रिएटर्स की कहानियां उन्हें आकर्षित कर रही हैं।

दुनिया भर के सर्वे दिखाते हैं कि जेन अल्फा (2010-2024 के बीच जन्मे बच्चे) में यूट्यूबर बनने की चाहत 32 प्रतिशत तक पहुंच गई है। टिकटॉक क्रिएटर और वीडियो गेम डेवलपर भी टॉप लिस्ट में शामिल हैं। भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। हाल के एक सर्वे के अनुसार, 37 प्रतिशत जेन-अल्फा बच्चे इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स की संख्या में सालाना 41 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो अब 83,000 से ज्यादा हो चुकी है।

2018 की रिसर्च से कितना अलग है आज का सच?

2018 में करीब 20,000 बच्चों पर किए गए सर्वे में डॉक्टर और इंजीनियर अभी भी टॉप प्राथमिकताएं थीं। बच्चे पारंपरिक करियर को स्थिर आय और सामाजिक सम्मान से जोड़ते थे। लेकिन महज कुछ सालों में ही तस्वीर बदल गई। आज बच्चे नौकरी की बजाय फ्रीडम, क्रिएटिविटी और तुरंत प्रसिद्धि चाहते हैं। सोशल मीडिया ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि घर बैठे लाखों-करोड़ों कमा सकते हैं।

यह बदलाव सिर्फ विकसित देशों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे विकासशील देशों में भी स्मार्टफोन और इंटरनेट का बढ़ता उपयोग बच्चों की करियर चॉइस को प्रभावित कर रहा है। बच्चे अब खिलाड़ियों या शिक्षकों की बजाय गेमिंग स्ट्रीमर्स और इंफ्लुएंसर्स को ज्यादा फॉलो करते हैं।

इस बदलाव के पीछे क्या कारण हैं?

सोशल मीडिया की पहुंच आसान हो गई है। बच्चे रोजाना सफल इंफ्लुएंसर्स की लाइफस्टाइल, यात्राएं, ब्रांड डील्स और वायरल होने की कहानियां देखते हैं। यह उन्हें पारंपरिक पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा रोमांचक लगती है। साथ ही, पैरेंट्स की व्यस्तता और स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चे इन प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा समय बिता रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, जेन अल्फा डिजिटल नेटिव हैं। वे पारंपरिक 9-5 जॉब्स की बजाय फ्लेक्सिबल करियर चाहते हैं। कुछ बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनकर फिर क्रिएटिव कंटेंट बनाना भी चाहते हैं, ताकि दोनों दुनिया का फायदा उठा सकें।

भारत में स्थिति: युवा पीढ़ी का नया रुझान

भारत में शिक्षा का दबाव हमेशा से रहा है, लेकिन अब बदलाव साफ दिख रहा है। कई शहरों में बच्चे कोचिंग की बजाय कंटेंट क्रिएशन स्किल्स सीखने में रुचि ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर भारतीय इंफ्लुएंसर्स की सफलता ने युवाओं को प्रेरित किया है। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावते हैं कि हर कोई इंफ्लुएंसर नहीं बन सकता। इसके लिए क्रिएटिविटी, कंसिस्टेंसी और मार्केटिंग स्किल्स जरूरी हैं।

पैरेंट्स को भी इस बदलाव को समझना चाहिए। बच्चों को सिर्फ पारंपरिक करियर थोपने की बजाय उनके जुनून को सपोर्ट करना चाहिए, लेकिन स्किल डेवलपमेंट और बैकअप प्लान पर भी जोर दें।

चुनौतियां और भविष्य की राह

इंफ्लुएंसर बनने का सपना आकर्षक है, लेकिन इसमें असफलता की दर बहुत ज्यादा है। ज्यादातर बच्चे वायरल होने की उम्मीद में समय बर्बाद कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य, प्राइवेसी और साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।另一方面, यह पीढ़ी नई स्किल्स जैसे वीडियो एडिटिंग, डिजिटल मार्केटिंग और स्टोरीटेलिंग सीख रही है, जो भविष्य में फायदेमंद साबित हो सकती हैं।

शिक्षा प्रणाली को भी अपडेट करने की जरूरत है। स्कूलों में डिजिटल स्किल्स, फाइनेंशियल लिटरेसी और क्रिएटिव थिंकिंग को शामिल किया जाना चाहिए।