बच्चे अब डॉक्टर-इंजीनियर नहीं, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं: बदलते सपनों की नई कहानी
हालिया रिसर्च में खुलासा हुआ है कि 60% से ज्यादा बच्चे अब सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर या यूट्यूबर बनना चाहते हैं। डॉक्टर-इंजीनियर जैसे पारंपरिक करियर की जगह डिजिटल दुनिया के सपने हावी हो रहे हैं। भारत समेत दुनिया भर में जेन अल्फा की यह बदलती सोच और इसके प्रभावों को विस्तार से जानें।
पहले के दौर में बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर या वैज्ञानिक बनने का सपना देखते थे। माता-पिता भी इन्हीं पेशों को सम्मान और स्थिरता का प्रतीक मानते थे। लेकिन आज का समय बदल रहा है। सोशल मीडिया की चमक-दमक ने बच्चों की दुनिया को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। हालिया रिसर्च बताती है कि अब ज्यादातर बच्चे यूट्यूबर, टिकटॉक क्रिएटर या सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। यह बदलाव सिर्फ सपनों का नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी की सोच का रूपांतरण है।
सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव: रिसर्च क्या कहती है?
2021 से 2024 तक की एक प्रमुख स्टडी में पाया गया कि मिडिल और हाई स्कूल के 60 प्रतिशत से ज्यादा छात्र-छात्राएं सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। इस रिसर्च में 7 साल के छोटे बच्चे भी शामिल थे। बच्चे स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को देखकर ही यह फैसला ले रहे हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर सफल क्रिएटर्स की कहानियां उन्हें आकर्षित कर रही हैं।
दुनिया भर के सर्वे दिखाते हैं कि जेन अल्फा (2010-2024 के बीच जन्मे बच्चे) में यूट्यूबर बनने की चाहत 32 प्रतिशत तक पहुंच गई है। टिकटॉक क्रिएटर और वीडियो गेम डेवलपर भी टॉप लिस्ट में शामिल हैं। भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। हाल के एक सर्वे के अनुसार, 37 प्रतिशत जेन-अल्फा बच्चे इंफ्लुएंसर बनना चाहते हैं। सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स की संख्या में सालाना 41 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो अब 83,000 से ज्यादा हो चुकी है।