भारत ने जब भी कोई बड़ा संकट झेला है, देश की सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियां (ओएमसी) ने ईंधन आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखकर अहम भूमिका निभाई है। चाहे 2015 की चेन्नई बाढ़ हो, कोविड-19 महामारी हो या हालिया पश्चिम एशिया का तनाव जो कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है, इन कंपनियों ने हमेशा देश की ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता दी।

ओएमसी कंपनियों की रणनीतिक अहमियत

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) देश की ऊर्जा जीवनरेखा हैं। विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय आपातकाल में इन पर सरकार की पकड़ ढीली करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा रही। ये कंपनियां कम मुनाफे, सरकारी हस्तक्षेप और बड़े परिचालन के कारण आलोचना का शिकार रहती हैं, लेकिन संकट के समय इनकी उपयोगिता साबित होती है।

निजीकरण की पुरानी कोशिशें और असफलता

वर्ष 2002 में बीपीसीएल और एचपीसीएल को बेचने की योजना बनी, लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले ने इसे रोक दिया। 2020 में फिर प्रयास हुआ, मगर पर्याप्त बोलियां न मिलने से प्रक्रिया रुक गई। 2026 तक भी इन कंपनियों का पूर्ण निजीकरण टलता दिख रहा है। सरकार इनकी रणनीतिक भूमिका को देखते हुए सतर्क है।

संकटों में निभाई गई जिम्मेदारी

2015 की विनाशकारी बाढ़ में चेन्नई जलमग्न हो गया था। तब इन तीनों कंपनियों ने वैकल्पिक मार्गों से ईंधन पहुंचाया, डूबे डिपो को बहाल किया और आपात सेवाओं को बिना रुके सप्लाई जारी रखी। कोविड-19 के दौरान लॉकडाउन के बावजूद ईंधन स्टेशन खुले रहे, रिफाइनरियां चालू रहीं और करोड़ों घरों तक एलपीजी सिलेंडर पहुंचे। राहत उड़ानों के लिए एटीएफ की आपूर्ति भी बरकरार रही।

वर्तमान घाटा और चुनौतियां

हाल ही में इन कंपनियों को 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रित रखने और वैश्विक कच्चे तेल की महंगाई के कारण रोजाना सैकड़ों करोड़ का नुकसान हो रहा है। फिर भी सरकार इन्हें निजी हाथों में सौंपने से बच रही है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और आम जनता तक सस्ती आपूर्ति इनकी मजबूत जिम्मेदारी है।

भविष्य की दिशा

विशेषज्ञ मानते हैं कि इन कंपनियों को बेचने से पहले ऊर्जा क्षेत्र की पूरी नीति पर गौर करना जरूरी है। निजीकरण से दक्षता बढ़ सकती है, लेकिन राष्ट्रीय संकटों में सरकारी नियंत्रण की जरूरत भी कम नहीं।