आजकल माता-पिता के लिए बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई बच्चे फोन छोड़ने को तैयार ही नहीं होते। मशहूर लेखक और वक्ता आचार्य प्रशांत ने इस मुद्दे पर अपनी सख्त राय रखी है। उनका कहना है कि बच्चों के हाथ में मोबाइल पहुंचने के पीछे माता-पिता की स्वार्थी सोच मुख्य वजह है।
माता-पिता की स्वार्थी भूमिका
आचार्य प्रशांत के अनुसार, जब बच्चा मोबाइल में व्यस्त रहता है तो मां-बाप को आराम मिलता है। बच्चा परेशान नहीं करता, इसलिए पेरेंट्स उसे फोन दे देते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर बच्चे के हाथ में मोबाइल होना ही क्यों चाहिए? वह ऐसी कौन-सी चीज सीख रहा है जिसके लिए अपना फोन जरूरी हो?
माता-पिता स्वार्थी और आलसी हैं। जब बच्चा मोबाइल में मुंह डालकर बैठा होता है तो बाप को और उससे भी ज्यादा मां को बड़ा आराम मिलता है। बच्चा अब उन्हें परेशान नहीं करता। बस, बात इतनी सी है।
बेहतर विकल्प क्या है?
आचार्य प्रशांत ने व्यावहारिक सुझाव दिया। अगर आपको बच्चे को कोई वीडियो या जानकारी दिखानी है तो अपने फोन को टीवी से कनेक्ट करके साथ बैठकर दिखाएं। बच्चे से कहें, “बेटा, मैं तुम्हें आधे घंटे के लिए यह वीडियो दिखाना चाहता हूं।” इसे बच्चे के हाथ में फोन थमाकर पूरा करने की जरूरत नहीं है।
यह तरीका न सिर्फ बच्चे की स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करता है बल्कि माता-पिता और बच्चे के बीच का बंधन भी मजबूत करता है।
मोबाइल की लत के खतरे
बच्चों में मोबाइल की लत बढ़ती जा रही है। इससे उनकी पढ़ाई, शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास पर बुरा असर पड़ता है। आचार्य प्रशांत की बातों से यह साफ है कि माता-पिता अगर समय निकालें तो बच्चे को बेहतर गतिविधियों की ओर मोड़ सकते हैं। फोन बच्चे को अकेला छोड़ने का साधन नहीं बनना चाहिए।
जिम्मेदारी समझें माता-पिता
आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि पालन-पोषण में समय और ऊर्जा लगानी पड़ती है। आराम की खातिर बच्चे को फोन सौंपना लापरवाही है। माता-पिता को समझना चाहिए कि बच्चे का भविष्य उनके हाथों में है। सही मार्गदर्शन से बच्चे स्वस्थ और जागरूक नागरिक बन सकते हैं।
समाज पर प्रभाव
यह समस्या सिर्फ एक परिवार की नहीं बल्कि पूरे समाज की है। अगर आज माता-पिता जागरूक नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी स्क्रीन पर जीने वाली हो जाएगी। आचार्य प्रशांत जैसे विचारक इस दिशा में जागृति फैला रहे हैं।