गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को शेयर बाजार में यस बैंक के शेयरों ने तेज गिरावट दर्ज की। इंट्राडे ट्रेडिंग में शेयर 20 प्रतिशत तक टूटकर ₹16.96 के निचले स्तर पर पहुंच गए। पिछले बंद भाव ₹21.20 के मुकाबले यह गिरावट निवेशकों के लिए चौंकाने वाली रही। ट्रेडिंग वॉल्यूम भी असामान्य रूप से बढ़ा और एनएसई तथा बीएसई मिलाकर 62 करोड़ से अधिक शेयरों का कारोबार हुआ। इस गिरावट की मुख्य वजह सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला था जिसमें यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के अतिरिक्त टियर-1 (AT1) बॉन्ड्स के राइट-ऑफ को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यस बैंक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने स्पष्ट कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। इस फैसले से बॉन्डधारकों को राहत मिली है, जबकि बैंक के लिए संभावित देनदारी का खतरा पैदा हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट के जनवरी 2023 के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने उस समय यस बैंक के एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा किए गए AT1 बॉन्ड्स के राइट-ऑफ को अवैध करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रमुख मुद्दों पर विचार किया। पहला, क्या बाद के घटनाक्रमों के कारण गुण-दोष पर फैसला लेने की जरूरत नहीं रह गई। दूसरा, क्या एडमिनिस्ट्रेटर के पास रिकंस्ट्रक्शन स्कीम में स्पष्ट प्रावधान के बिना बॉन्ड्स को राइट डाउन करने का अधिकार था। तीसरा, क्या यह कदम आरबीआई के मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड्स के सूचना ज्ञापन के अनुरूप था।
बेंच ने दोनों महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नकारात्मक दिया। अदालत ने कहा कि अंतिम रिकंस्ट्रक्शन स्कीम में AT1 बॉन्ड्स को राइट-ऑफ करने का कोई प्रावधान नहीं था। एडमिनिस्ट्रेटर ने बैंक के पुनर्गठन के बाद यह कदम उठाया था, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह कार्रवाई मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड की शर्तों के अनुरूप नहीं थी।
यह विवाद मार्च 2020 का है जब यस बैंक गंभीर वित्तीय संकट में था। आरबीआई ने बैंक पर अधिस्थगन लगाया और एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया। पुनर्निर्माण योजना के तहत एसबीआई के नेतृत्व में पूंजी डाली गई। इसी प्रक्रिया में ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड्स को शून्य कर दिया गया। इनमें दिसंबर 2016 में जारी ₹3,000 करोड़ और अक्टूबर 2017 में जारी ₹5,415 करोड़ के बॉन्ड शामिल थे। इन बॉन्ड्स पर 9.5 प्रतिशत और 9 प्रतिशत की कूपन दर थी।
यस बैंक शेयरों पर तत्काल प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर आते ही बाजार में भारी बिकवाली शुरू हो गई। यस बैंक के शेयर इंट्राडे में 20 प्रतिशत तक गिरे। बाद में कुछ रिकवरी के साथ बंद भाव लगभग ₹18.12 से ₹18.15 के आसपास रहा, जो 14 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्शाता है। बाजार पूंजीकरण घटकर लगभग ₹57,000 करोड़ के आसपास आ गया। भारी वॉल्यूम के साथ शेयर लोअर सर्किट के करीब पहुंच गए।
निवेशकों में घबराहट इसलिए फैली क्योंकि बैंक अब इन बॉन्ड्स को सम्मानित करने या संबंधित देनदारी का सामना करने की स्थिति में आ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बॉन्ड्स को बहाल किया जाता है तो बैंक को पूंजी बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। जापानी बैंक सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन (SMBC) जो हाल के वर्षों में यस बैंक में बड़ा निवेशक बना है, उसकी स्थिति भी इस फैसले से प्रभावित हो सकती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्व की देनदारियों का बोझ मौजूदा शेयरधारकों पर पड़ सकता है।
AT1 बॉन्ड क्या होते हैं और विवाद की पूरी कहानी
अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड बैंकों द्वारा पूंजी बढ़ाने के लिए जारी किए जाने वाले स्थायी ऋण उपकरण हैं। ये बॉन्ड नुकसान को अवशोषित करने के लिए बनाए गए हैं। जब बैंक की पूंजी कुछ सीमा से नीचे चली जाती है तो इन्हें राइट डाउन या परिवर्तित किया जा सकता है। यस बैंक के मामले में कई खुदरा निवेशकों ने शिकायत की थी कि उन्हें ये बॉन्ड सुरक्षित निवेश के रूप में बेचे गए थे। कई वरिष्ठ नागरिकों और छोटे निवेशकों को इनकी जोखिम भरी प्रकृति के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई थी।
2020 में राइट-ऑफ के बाद बॉन्डधारकों ने अदालत का रुख किया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 20 जनवरी 2023 को फैसला सुनाते हुए कहा कि अंतिम पुनर्निर्माण योजना में राइट-ऑफ का प्रावधान नहीं था। हाई कोर्ट ने एडमिनिस्ट्रेटर के आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी जो अब हटा दी गई है।
इस लंबे कानूनी संघर्ष में बॉन्डधारकों की तरफ से तर्क दिया गया कि अंतिम योजना में ड्राफ्ट के मुकाबले राइट-ऑफ का प्रावधान हटा दिया गया था। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार किया। फैसले से उन निवेशकों को राहत मिली है जिन्होंने वर्षों तक इंतजार किया।
निवेशकों और बैंक के लिए आगे की राह
अब यस बैंक को इस देनदारी से निपटने के तरीके तय करने होंगे। संभावित विकल्पों में बॉन्ड्स को बहाल करना, कूपन भुगतान करना, या किसी समझौते के जरिए निपटारा शामिल हो सकता है। बैंक को अपनी पूंजी पर्याप्तता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पूंजी जुटानी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि राइट्स इश्यू या अन्य पूंजी जुटाने के उपाय सामने आ सकते हैं।
शेयरधारकों के लिए यह फैसला नकारात्मक संकेत है। संभावित देनदारी बैंक के मुनाफे और पूंजी अनुपात पर असर डाल सकती है। वहीं बॉन्डधारकों के लिए यह जीत है। कई म्यूचुअल फंड और संस्थागत निवेशक भी इससे लाभान्वित हो सकते हैं जिन्होंने इन बॉन्ड्स को पहले शून्य कर दिया था।
बाजार पर्यवेक्षकों का मानना है कि यस बैंक के प्रबंधन को जल्द स्पष्टता देनी चाहिए कि वह इस फैसले का पालन कैसे करेगा। एक्सचेंजों ने भी बैंक से स्पष्टीकरण मांगा है। आने वाले दिनों में बैंक का बोर्ड इस मुद्दे पर चर्चा कर सकता है।
बैंकिंग क्षेत्र पर व्यापक प्रभाव
यह फैसला भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में AT1 बॉन्ड्स के इस्तेमाल और बैंक समाधान प्रक्रिया के बारे में महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। अब भविष्य में बैंकों को पुनर्निर्माण योजनाओं में ऐसे प्रावधानों को बहुत सावधानी से शामिल करना होगा। नियामकों को भी मास्टर सर्कुलर और योजनाओं के बीच सामंजस्य बनाए रखने की जरूरत पड़ेगी।
निवेशकों के लिए सबक यह है कि उच्च प्रतिफल वाले बॉन्ड्स में जोखिम भी अधिक होता है। बैंक संबंध प्रबंधकों द्वारा बेचे गए उत्पादों को हमेशा सुरक्षित नहीं समझना चाहिए। एटी1 बॉन्ड सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट या साधारण बॉन्ड से अलग होते हैं।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यस बैंक और उसके हितधारकों के लिए महत्वपूर्ण मोड़ है। बॉन्डधारकों को न्याय मिला है, लेकिन बैंक को संभावित वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ेगा। निवेशकों को अब बैंक के अगले कदमों और पूंजी योजनाओं पर नजर रखनी चाहिए। बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है जब तक कि स्पष्टता नहीं आ जाती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: यस बैंक के शेयर क्यों गिरे?
सुप्रीम कोर्ट ने ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड राइट-ऑफ को रद्द करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इससे बैंक पर संभावित देनदारी का खतरा बढ़ गया।
प्रश्न 2: AT1 बॉन्ड क्या होते हैं?
ये बैंकों द्वारा पूंजी बढ़ाने के लिए जारी स्थायी बॉन्ड हैं जो वित्तीय संकट में नुकसान को अवशोषित कर सकते हैं।
प्रश्न 3: बॉन्डधारकों को अब क्या मिलेगा?
फैसले के बाद बॉन्ड्स बहाल होने या संबंधित दावों के निपटारे की संभावना है। सटीक प्रक्रिया अदालत के विस्तृत आदेश और बैंक के कदमों पर निर्भर करेगी।
प्रश्न 4: क्या बैंक को पूंजी बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी?
संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि देनदारी पूरा करने के लिए पूंजी जुटाने के उपाय किए जा सकते हैं।
प्रश्न 5: SMBC पर क्या असर पड़ेगा?
यदि पूर्व की देनदारियों से SMBC को छूट मिली तो मौजूदा शेयरधारकों पर बोझ बढ़ सकता है।